नींद खुमारी

30 जून

नींद खुमारी

भोर सुहानी

30 जून

Haiga

अंधेरे कोनों के उजियारे

14 अक्टूबर

अंधेरे कोनों के उजियारे
मौसम बदल रहा था।अब वो पहिले सी असहनीय गर्मी भी नही थी। सुबह शाम हल्‍की ठंड होने लगी थी। दीपावली नज़दीक थी, बाज़ार सज रहे थे। बाज़ारों में घूमने और खरीददारी करने का मज़ा इन्हीं दिनों था। हर तरफ बहुत रौनक थी। रात में तो सारा शहर ही जगमगा रहा था। जिसे देखो वही लम्बी -लम्बी फाहरिस्तें बना कर बाज़ार में खरीददारी कर रहे थे या इस कार्य के लिये निकाल रहे थे। कहीं भी दिनों दिन बढ़ती महंगाई का असर मानो लोग बाग महसूस नहीं कर रहे थे।
हर घर में लोग रंगाई पुताई और सफाई में व्यस्त थे। नौकरी पेशा लोगों को थोड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है क्योंकि उन्हें सिर्फ रविवार का ही दिन मिलता है इस कार्य के लिये। परन्तु जैसे तैसे करके वे भी यह सब कर ही लेते हैं। ज्योति ने भी घर की सफाई शुरू कर दी थी। उसकी योजना के अनुसार यदि एक दिन में एक कमरा साफ किया जाये तो, एक हफ्ते में सारा काम पूरा हो सकता था। तीन चार दिन में सभी कमरे हो चुके थे। पर्दे वॉशिंग मशीन में धुल चुके थे।अब स्टोर,बाथरूम,बरामदे वगैरह रह गये थे।
अचानक एक दिन चिराग स्‍कूल से आया तो उसे तेज बुखार था। दो दिन तक दवाइयाँ देने के बावजूद भी उसकी तबियत में कोई सुधार नहीं हुआ तथा बुखार ज्यों का त्यों ही बना रहा। ज्योति और प्रकाश ने घबरा कर उसे पास के ही निजी अस्‍पताल में ले जा कर दिखाया, जहॉं उसे भर्ती कर लिया गया । प्रकाश को भी उस दिन आफिस से छुट्टी लेनी पड़ी थी। चिराग अभी छोटा ही था, पाँच वर्ष का भी पूरा नहीं हुआ था। दूसरे दिन शिप्रा को स्‍कूल भेज कर ज्योति भी अपने और प्रकाश के लिए टिफिन ले कर अस्पताल ही चली गयी थी। सारे टेस्ट होंगे उसके बाद ही पता चलेगा कि चिराग को क्या हुआ है। अतः सारे टेस्ट कराये गये और उसके बाद ज्योति ने प्रकाश को घर भेज दिया ताकि वो नहा धोकर थोड़ा आराम करलें क्योंकि फिर रात भर जागना पड़ सकता था। चार दिन बाद जाकर बुखार उतरा तथा पांचवें दिन अस्‍पताल से छुट्टी मिल गई । वे लोग चिराग को लेकर घर आगये। पाँच दिन का अस्‍पताल का बिल ही चुकाना भारी पड़ गया। चिराग अभी भी पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हुआ था और वह बहुत कमजोर हो गया था।उसे बहुत देखभाल की जरूरत थी।
ज्योति उसका बहुत ध्यान रख रही थी। दूध के अलावा उसको फल भी दे रही थी। फल में सेव अच्छा आ रहा था।उसने सोचा हफ्ते भर मौसमी का रस और टॉनिक भी दे ही देने चाहिए।
शिप्रा भी यों तो छोटी ही थी, पर घर की परिस्थितियों से पूर्ण रूप से वाकिफ थी। उसे सब पता था की उस समय परिवार कठिन दौर से गुजर रहा था। अब तो स्कूल की भी दीपावली के उपलक्ष में छुट्टियाँ हो गई थीं । दीपावली के कुछ दिन ही अभी शेष थे इसलिये ज्योति ने प्रकाश के साथ बैठ कर बाज़ार से लाने वाले समस्त सामान की लिस्ट बनानी चालू की । सबसे पहिले उसने अपनी साड़ी की ही कटौती करने के लिये सोचा,तो प्रकाश उबल पड़े और बोले –
” तुम्हारी ही साड़ी क्यों ना आयेगी?”
ज्योति ने समझाया “उसकी जरूरत नहीं है मुझे।बहुत साड़ियाँ पड़ी हैं मेरे पास। मैं उन में से ही एक पहिन लूंगी।”
“तो मैं भी अपने पैंट-शर्ट नहीं लाउँगा” प्रकाश ने अपना फैसला सुनाया।
” नहीं नहीं।तुम्हारी पैंट शर्ट तो बहुत जरूरी है, कितने दिनों से लेने की सोच रहे थे। तुम दीवाली के लिये टाले जा रहे थे। शिप्रा के लिये दो की जगह एक फ्राक और चिराग के कपड़े बस।”
चलो जैसे-तैसे करके फैसला हो ही गया। प्रकाश पूजा की सामग्री के साथ साथ पटाखों की लिस्ट भी बनाने लगे, तो ज्योति ने दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसलिये जब प्रकाश ने पूछा तो वह बोली ” चिराग तो अभी बीमारी से उठा ही है और वैसे भी वह पटाखों से बहुत डरता है अत: आप शिप्रा से पूछ कर देखलो।”
” नहीं नहीं ऐसा कैसे हो सकता है। यह क्या दीवाली हुई ? यह नहीं वो नहीं…….।बच्चे दीवाली पर पटाख़े भी नहीं छुड़ाएगें क्या?…तुम चाहती क्या हो? हम दीवाली ही नहीं मनायें क्या ? कोई शोक तो नहीं है ना घर में ?” प्रकाश तुनक कर बोले ।
ज्योति बोली ” पकवान पूरा बनाउँगी ।हम मिठाई भी लायेगें।पूजा भी अच्छे से करेंगें। बस रही पटाखों की बात, तो आप शिप्रा से ही बात करलो वही ठीक रहेगा।”
“शिप्रा तो बच्ची है वो क्या समझती है।जैसा तुम कहोगी वो तो वही बोलेगी ना।” प्रकाश नाराज होने लगे।
ज्योति ने माहौल गर्म होते देख वहाँ से उठ जाना ही उचित समझा। 

26 जनवरी

बाबू जी का श्राद्ध

श्राद्ध पक्ष चल रहे थे । घर में बाबूजी का ग्यारस का श्राद्ध निकालना था । दो चार दिन पहिले से ही पंडित जी को न्योता दे दिया था । एन दिन पर सुबह जब याद दिलाने के लिये पंडित जी को फ़ोन किया तो वे कहने लगे ” क्या करूँ मुझे तो बिल्कुल समय नहीं है, दूसरी जगह से भी न्योता है पहिले वहां जाकर फिर वहीं से आफिस चला जाउँगा । आपके यहाँ तो शाम को ही आ पाउँगा ।” क्या करते आजकल पंडित मिलते कहाँ हैं सो मानना पड़ा । फिर थोड़ी देर में उन्हीं का फोन आया और बोले ” खाने का इंतज़ाम टेबिल-चेयर पर करियेगा मैं नीचे बैठ कर खाना नहीं खाउंगा , और दक्षिणा में कपड़ों के अलावा कम से कम सौ रुपये देने होगें । यदि आपको मंजूर हो तो मुझे आफिस में ही फोन कर बतादेना ।
हम सभी का सिर चकरा गया । ये पंडित जी आ रहे थे या कोई अफसर आ रहे थे जिनका हमें स्वागत करना था । सोच में पड़ गये की क्या करें ? श्राद्ध का खाना तो सुबह ही खिलाना चाहते थे । जब तक श्राद्ध निकाल कर पंडित जी को भोजन ना करा दें घर का भी कोई सदस्य खाना न खाये ऐसी परम्परा थी ।
थोड़ी देर में देखा कि द्वार पर एक बूढ़ा आदमी निढ़ाल अवस्था में बैठा था और बुद-बुदा रहा था -” मैं बहुत भूखा हूँ । कई दिनों से ठीक से खाना भी नसीब नहीं हुआ है । कुछ खाना देदो ।”
उस पर बड़ी दया आ गयी । उसे घर के अहाते में बैठा कर आग्रह पूर्वक खाना खिलाया । वह भरपेट खाना खा कर और पानी पी कर, ढेर सारी आशीष देता हुआ चला गया । तब लगा आज बाबूजी का श्राद्ध ठीक से सम्पन्न हुआ है ।

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लघुकथा-17. सुख दुःख

17 सितम्बर

सुख दुःख
आभा की दो बेटियाँ थीं। उसके विपरीत विभा के दो बैठे थे। आभा की दोनों बेटियों की शादी हो गई थीं। वे अपने -अपने घर चली गईं तो वो उदास बैठी थी। उसने विभा से कहा” हमारी तो दोनों ही बेटियाँ चली गईं। घर एकदम से सूना हो गया है। हम तो बहुत अकेले हो गये हैं। अब हमें कौन सम्भालेगा?”
विभा ने समझाते हुए कहा ” तूने तो अपना दायित्व पूरा किया है। तुझे तो खुश होना चाहिए। उन्हें तो अपने-अपने ससुराल जाना ही था। तुझे तो अपने आपको बहुत खुशनसीब समझना चाहिए।”
आभा ने फिर दुखी होते हुए कहा ” नहीं विभा! हम तो बहुत अकेले हो गये हैं उन दोनों के जाने से। परन्तु तू तो हमेशा बेटे -बहुओं और पोते पोतियों के साथ रहेगी। तेरा तो घर भरा ही रहेगा। दुख और सुख में बेटे हमेशा तेरे साथ ही रहेंगे।”
इस पर विभा तुनक कर बोली , “दूर के ढोल सुहावने लगाते हैं। तेरी तो ज़िम्मेदारियाँ पूरी हो गईं। अब तुझे कोई परेशानी नहीं है। मुझे देख, मुझे तो दोनों बेटों के साथ-साथ बहुओं के नख़रे भी सहने पड़ते हैं। रोज़ घर में नये-नये झग़ड़े होते रहते हैं। जीना मुश्किल हो गया है । खैर ! जिस पर गुजरती है वही समझता है , तू नहीं समझेगी ।”
अब आभा को फैसला करना मुश्किल था की कौन सुखी है और कौन दुखी ?
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HINDI HAIKU (MAA)

15 मई

1
माँ तू तो झट
मान जाती है जैसे
पिघली बर्फ।
2
माँ तुझे चाहूँ
रेगिस्तान में जैसे
प्यासा जल को।
3
बादल बन
छा जाती माँ तुम
कड़ी धूप में।
4
घने वृक्ष -सी
छाया देता शीतल
माँ का आँचल ।
5
आँखों से नेह
बनकर बरसा
माँ का दुलार।
6
कुछ न चाहे
सब कुछ देकर
माँ रहे खुश।
7
ईश्वर से भी
पहले माँ तुमको
शीश नवाऊँ ।

हिन्द…

27 अप्रैल

हिन्दी हाइकु-२

बीच झील में
उतरी इठ्लाती
चाँदनी रात।

फिर आयेगी
अंधेरे को चीरती
उजली रात।

ले चली रात
झिलमिल सितारों
की ये बारात।

यों लगा मुझे
पर्वतों से घटायें
आ मिलीं गले।

नीम निंंबौरी
आम औ अमिया सा
अल्ह्ड़पन।

फैला उजाला
चाहों ने फिर घेरा
आशा का डेरा।